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1966 से हुई अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की शुरुआत, भारत में आज भी शिक्षा का हाल बेहाल

By: C4E Team Sun, 08 Sept 2019 2:48 PM

1966 से हुई अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की शुरुआत, भारत में आज भी शिक्षा का हाल बेहाल

आज 8 सितंबर हैं और आज का दिन पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। इस दिन की शुरुआत 1966 से इस उद्देश्य से की गई थी कि मानव द्वारा अपने और समाज के विकास के लिए उनमें चेतना जगाई जाए और उन्हें अपने अधिकारों से अवगत कराया जाए। साक्षरता को सिर्फ शिक्षा से ही नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि इसका तात्पर्य हैं कि व्यक्ति को अपने अधिकारों की जानकारी होना और कर्तव्यों का निर्वहन करना। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक, दुनियाभर में चार अरब लोग साक्षर हैं और आज भी 1 अरब लोग पढ़-लिख नहीं सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने को लेकर पहली बार साल 1965 में 8 से 19 सितंबर के बीच ईरान के तेहरान में शिक्षा के मंत्रियों के विश्व सम्मेलन के दौरान चर्चा की गई थी। इसके बाद 26 अक्टूबर, 1966 को यूनेस्को ने 14वें जनरल कॉन्फ्रेंस में घोषणा करते हुए कहा कि हर साल दुनियाभर में 8 सितंबर को 'अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।

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2018 में जारी एमएचआरडी की शैक्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की साक्षरता दर 69.1% है। यह नंबर गांव और शहर दोनों को मिलाकर है। ग्रामीण भारत में साक्षरता दर 64.7 पर्सेंट है जिसमें महिलाओं का लिटरेसी रेट 56.8% तो पुरुषों का 72.3% है। बात करें शहरी भारत की तो इसमें साक्षरता दर 79.5 पर्सेंट है जिसमें 74.8% महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं। वहीं, 83.7 पुरुष पढ़े-लिखे हैं।

भारत में साक्षरता दर कम होने के पीछे कई कारण हैं। इनमें विद्यालयों की कमी, स्कूल में शौचालय आदि का ना होना, जातिवाद, गरीबी, लड़कियों से छेड़छाड़ होने का डर, जागरूकता की कमी जैसी कई चीजें शामिल हैं।

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